लौकिक साहित्य
इस साक्ष्य के अन्तर्गत वह सामग्री आती है जो हमें साहित्यिक ग्रंथो केअतिरिक्त किसी अन्य रूप में लिखी हुई प्राप्त होती है। इस साक्ष्य के मोटे तौर पर ये उपभेद किए जा सकते हैं - (1) गुफा लेख, (2) शिलालेख, (3) सतम्भ लेख तथा (4) ताम्र-पत्रों परअंकित लेंख।
इन लेखों में कुछ राजशासन अथवा राजाज्ञयें हैं, कुछ दान लेख हैं तथा कुछ प्रशस्तियाँ हैं। इस प्रकार इन लेखों के विषयों में बड़ी विविधता मिलती है। इतिहास के साक्ष्य के रूप में इनका महत्त्व इसलिये औरअधिक है क्योंकि ये उस समय के साक्ष्य होते हैं। प्राचीन भारत के कई लेखों से न केवल विविध राजनीतिक महत्त्व की समस्याओं पर प्रकाश पड़ता है अपितु तत्कालीन साहित्य, संस्कृति एवं जन-जीवन के अन्य पक्षों पर भी इनसे महत्त्वपूर्ण सूचनायें मिलती हैं। इन लेखों में शासकों के नाम, शासनवंश, तिथि और समसामयिक घटनाओं का विवरण मिलता है। कभी-कभी इन लेखों से साहित्यिक ग्रन्थों द्वारा पहले से वर्णित सूचनाओं का समर्थन होता है जिससे इतिहासकार उस विषय पर और भी अधिक निश्चित मत बनासकता है।
उदाहरण के लिये, मौर्यकालीन प्रशासन अथवा जन-जीवन के विषय में कौटिल्य के अर्थशासत्र तथा मेगस्थनीज के इंडिका से जो जानकारी मिलती है, अशोक के लेखों से उनका प्राय: समर्थन होता है और इस प्रकार प्राप्त ऐतिहासिक सूचना और अधिक प्रामाणिक बन जाती है। हर्ष के विषय में बाण के हर्षचरित से जो सूचनायें मिलती हैं,हर्ष के लेखों से उनका समर्थन होता है। अशोक के व्यक्तिगत नाम के विषय में सबसे पहले उसके मास्की लेख से सूचना मिली। इसी प्रकार हेलियोडोर के बेसनगर अभिलेख (मध्य प्रदेश में आधुनिक विदिशा) से यह महत्त्वपूर्ण सूचना मिलती है कि इस लेख के समय तक भागवत धर्म इतना लोकप्रिय हो चला था कि विदेशी लोग भी इसे स्वीकार करने लगे थे। अशोक के लेख संख्या में इतने अधिक हैं तथा उनमें मिलने वाली सूचनाययें इतनी विशद और महत्व की हैं कि उन्हें स्वयं में एक साहित्य का नाम दिया जा सकता है। भारतीय इतिहास के इस महत्त्वपूर्ण शासक तथा सामान्य रूप से मौर्य शासन वंश के विषय में इनसे जो महत्त्वपूर्ण सूचनायें मिलती हैं उनके बिना इस सम्बन्ध में हमारी जानकारी सर्वथा अधूरी रहतो है। इसी प्रकार समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति के बिना हम इस महत्त्वपूर्ण शासक के विषय में कुछ भी नहीं जान पाते। यही बात हम कलिंग के शासक खारवेल के विषय में कह सकते हैं जिसके विषय में हमारी सुचना का आधार हाथीगुम्फा अभिलेख है। कभी-कभी लेखों में लेख के जारी करने वाले शासक के नाम के अतिरिक्त उसकी बंशावलो भी दो गई रहती है। उदाहरण के लिये रुद्रदामन् के लेख से यह ज्ञात होता है कि वह उयदामन का पुत्र और चष्टन का पौत्र था। वंशावली की यह परम्परा गुप्त लेखों में अपनी चरम सीमा पर दिखाई पड़ती है। वंशावली की सहायता से इतिहासकारों को उत्तराधिकार क्रम: समझने में बड़ी-सहायता मिलती” है;। शासकों के नामों के आगे-दी गई उपाधियों से यह जानने में सहायता मिलती है कि वे प्रभुतासम्पनन और स्वतंत्र शासक थे अथवा किसी अन्य शक्तिशाली शासक के सामन्त अथवों अधीनस्थ के रूप में राज्य करते थे। इन लेखों से शासन व्यवस्था के ऊपर भी महत्त्वपूर्ण प्रकाश पड़ता है। इन में पदाधिकारियों के नाम ,और उनके कार्य व्यापारों का विवरण भी प्राप्त होता है। साम्राज्य की विविध प्रशासनिक इकाइयों के सम्बन्ध में भी इनसे सूचना मिलती है। प्राचीन भारत के कुछ लेख साहित्यिक महत्त्व के भी मिलते हैं। रुद्रदामन् के जूनागढ़ के अभिलेख का योग विद्वानों ने संस्कृत भाषा के विकास क्रम को समझने में किया है। धार तथा अजमेर के. चट्टानों पर नाटक लिखे हुए मिले हैं। इसी संदर्भ में पुष्यमित्र शुंग काअयोध्या अभिलेख, दशरथ के नागार्जुनी गुहालेख, सातवाहनों के नासिक, नानाघाट और काले के लेख तथा गुप्त नरेशों के गुहालेख उल्लेखनीय हैं। पर्वतीय अंचलों से प्राप्त गुहालेख दक्षिण भारत की तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक स्थिति पर प्रकाश डालने के साथ शक-सातवांहन संघर्ष को भी दर्शाते हैं।
इसी प्रकार के अभिलेख दानपत्र, स्मारक-पत्र तथा मुद्राओं पर भी उपलब्ध हुए हैं। इतिहासकार फ्लीट ने इन अभिलेखों का महत्त्व बताते हुए लिखा है “प्राचीन भारत के राजनीतिक इतिहास का ज्ञान हमें धैर्यपूर्वक इनके अध्ययन से प्राप्त होता है।” सांची भारहुत; अमरावती आदि स्तूपों पर अनेक लेख-अंकित मिले हैं जो इतिहास की दृष्टि से ,बडे महत्त्वपूर्ण हैं। ब्राह्मण, बोद्ध एवं जैन मूर्तियों पर उत्कीर्ण लेख भी इतिहास निर्माण में सहायक सिद्ध हुए हैं।
कुछ विदेशी अभिलेख जैसेकि बोगजकोई, पर्सिपोलिस तथा नक्शे रुस्तम अति उल्लेखनीय अभिलेख भी प्राचीन भारतीय इतिहास की विवेचना करते हैं | वैदिक आर्यों का सम्बन्ध एशिया माइनर से प्राप्त बोगजकोई अभिलेख में वरुण; इन्द्र और नासत्य आदि वैदिक देवताओं के उल्लेख से प्रकट एवं प्रमाणित होता है। पुदुकोट्टा के अन्तर्गत कुडुमियामलै नामक स्थान से प्राप्त लेख में संगीत के नियम बताये गये हैं।
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