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Showing posts from June, 2022

लौकिक साहित्य

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लौकिक साहित्य इस श्रेणी के अन्तर्गत आने वाले ग्रन्थ विविध अन्य विषयों को ध्यान में रखकर लिखे गये हैं। किंतु इनकी अन्तर्सामग्री ऐतिहासिक दृष्टि से पर्याप्त महत्त्व की है। कौटिल्य का अर्थसास्त्र इस श्रेणी केअन्तर्गत आने वाला सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इससे मौर्यकालीन प्रशासन पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। पाणिनि द्वारा लिखी गई अष्टाध्यायी तथा पतंजलि द्वारा इस पर लिखा गया भाष्य (महाभाष्य) व्याकरण ग्रन्थ हैं किन्तु प्रसंग वंश ये कई महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक सूचनायें प्रदान करते हैं। डा. वासुदेव शरण ने अष्टाध्यायी के आधार पर पाणिनिकालीन भारत नामक पुस्तक लिखी है जिसमें तत्कालीन समाज एवं संस्कृति की बड़ा व्यापक चित्रण मिलता है। पतंजलि के महाभाष्य से  यवनों द्वरा साकेत तथा मध्यमिका व आक्रमण की उल्लेख मिलता है। गार्गी संहिता मे भी यवन आक्रमण को चर्चा मिलती है। तमिल ग्रंथ पुरुनानूरु तथा मणिमेकलाई की गनना भी इसी श्रेणी के साहित्य में की जानी चाहिये | प्राचीन भारत का इतिहास लिखने में आधुनिक विद्वनो को इन  ग्रन्थों में मिलने वाली सूचनाओं से बड़ी सहायता मिली है। इमी प्रसंग में उन नाटक ग्रंथ...

लौकिक साहित्य

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लौकिक साहित्य इस श्रेणी के अन्तर्गत आने वाले ग्रन्थ विविध अन्य विषयों को ध्यान में रखकर लिखे गये हैं। किंतु इनकी अन्तर्सामग्री ऐतिहासिक दृष्टि से पर्याप्त महत्त्व की है। कौटिल्य का अर्थसास्त्र इस श्रेणी केअन्तर्गत आने वाला सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इससे मौर्यकालीन प्रशासन पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। पाणिनि द्वारा लिखी गई अष्टाध्यायी तथा पतंजलि द्वारा इस पर लिखा गया भाष्य (महाभाष्य) व्याकरण ग्रन्थ हैं किन्तु प्रसंग वंश ये कई महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक सूचनायें प्रदान करते हैं। डा. वासुदेव शरण ने अष्टाध्यायी के आधार पर पाणिनिकालीन भारत नामक पुस्तक लिखी है जिसमें तत्कालीन समाज एवं संस्कृति की बड़ा व्यापक चित्रण मिलता है। पतंजलि के महाभाष्य से  यवनों द्वरा साकेत तथा मध्यमिका व आक्रमण की उल्लेख मिलता है। गार्गी संहिता मे भी यवन आक्रमण को चर्चा मिलती है। तमिल ग्रंथ पुरुनानूरु तथा मणिमेकलाई की गनना भी इसी श्रेणी के साहित्य में की जानी चाहिये | प्राचीन भारत का इतिहास लिखने में आधुनिक विद्वनो को इन  ग्रन्थों में मिलने वाली सूचनाओं से बड़ी सहायता मिली है। इमी प्रसंग में उन नाटक ग्रंथ...

प्राचीन ऐतिहासिक ग्रंथ

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 प्राचीन ऐतिहासिक ग्रंथ  आज इतिहास की पुस्तकें वैज्ञानिक रीति को अपनाते हुए लिखी जाती हैं। वैज्ञानिक रीति से इतिहास लिखने का तात्पर्य यह है कि इतिहासकार घटनाओं का विवरण देने में अपनी भावनाओं और मान्यताओं से प्रभावित न होकर तटस्थ भाव से लिखे, विवरण में कल्पना और अतिरंजना न हो इसकी चेष्टा घटनाओं का यथारूप वर्णन करना होती चाहिए तथा लेखन में तिथिक्रम का सावधानी से निर्वाह किया जाय। इस रूप में लिखे गये ग्रन्थ प्राचीन भारत से कम ही मिलते हैं। इस प्रकार की पुस्तकों के अ भाव के कारण कुछ पाश्चात्य और भारतीय विद्वानों ने यह कहा कि प्राचीन भारतीयों में ऐतिहासिक बुद्धि का अभाव था। इन विद्वानों ने इस के कई कारण बताये। जहां कुछ विद्वानों ने इस मनोवृत्ति का कारण भारत की जलवायु में खोजा, कुछ ने यह कहा कि प्राचीन भारत के लोग माया और कर्म के सिद्धांतों तथा अन्य आध्यात्मिक विषयों के चिन्तन में इतने डूबे रहे कि वे इतिहास को कोई महत्त्व नहीं दे पाये। किन्तु इन मतों की सत्यता को स्वीकार नहीं किया जा सकता। वास्तव में प्राचीन भारतीय इतिहास को सर्वथा उस रूप में नहीं समझते थे जिस रूप में इसे आज समझा जा...

जैन ग्रन्थ

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  जैन ग्रन्थ बहुत दिनों तकअधिकांश जैन ग्रन्थ अप्रकाशित रहे और प्राचीन भारत के इतिहास लेखन में इसका उपयोग अत्यन्त विरल रहा। किन्तु धीरे-धीरे अब इतिहास लेखन में इनका अधिक उपयोग होने लगा है। प्रारम्भिक जैन ग्रन्थ अंग नाम से जाने जाते हैं और इनकी संख्या 11अथवां 12 है। ये ग्रन्थ अर्द्ममागधी भाषा में लिखे हुए हैं। यद्यपि ग्रन्थ रूप में इनका संकलन काफी बाद का है तथापि इनमें उपलब्ध विवरण अत्यन्त पहले के ऐतिहासिक स्थिति की चर्चा करते हैं। आचारांग सूत्र, उत्तराध्ययन सूत्र, कल्पसूत्र, भगवती सूत्र इत्यादि महत्त्वपूर्ण प्राचीन जैन ग्रन्थ हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण जैन ग्रन्थ हेमचंद्र रचित परिशिष्टपर्वन है। एक अन्य ग्रन्थ भद्गाबाहुचरित से भी कुछ महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक सूचनायें मिलती  हैं । कथाकोष, लोकविभाग तथा पुण्याश्रव-कथाकोष अन्य महत्त्वपूर्ण जैन ग्रन्थ हैं।

बौद्ध ग्रन्थ

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 बौद्ध ग्रन्थ छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व में प्राचीन भारत में जो धार्षिक आन्दोलन हुआ  उसके अन्तर्गत बौद्ध और जैन धर्मों को विशेष रूप से प्रतिष्ठा हुई। कालान्तर में इन धर्मों से सम्बद्ध विविध ग्रन्थों की रचना हुई, जिनमें भरपूर ऐतिहासिक सामग्री भरी पड़ी है ।  “ बौद्ध ग्रन्थों में सबसे पहले जातक ग्रन्थों का स्थान आता है । जातक कथाओं में बुद्ध के पूर्व जीवन की कथायें दी गई हैं ओर इनमें से कुछ कथायें छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व के पहले के जन-जीवन पर भी प्रकाश डालती है। इन्हीं जातक कथाओं को आधार बनाकर रतिलाल मेहता ने अपनी पुस्तक प्री-बुद्धिस्ट इण्डिया में बुद्ध से पूर्व के भारतीय समाज और जन-जीवन का विवरण देने का प्रयास किया है | प्रारम्भिक बोद्ध ग्रन्थ पालि भाषा में लिखे हुए हैं। बुद्ध के वचनों का संकलन तीन पृथक् -पृथक् ग्रन्थों के अन्तर्गत हुआ जिन्हें सामूहिक रूप से त्रिपिटक की संज्ञा दी गई। ये तीन पिटक हैं - विनय पिटक, सुत्त पिटक एवं अभिधम्म पिटक | त्रिपिटक का रचना काल तथा इनमें प्राप्त सूचनाओं का समय मुख्य रूप से छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व तथा तीसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व के बीच का मानना ...

ब्राह्मण साहित्य

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ब्राह्मण साहित्य ब्राह्मण साहित्य के अन्तर्गत सर्वप्रथम वैदिक, साहित्य आता है। वेदिक साहित्य में ऋग्वेद प्राचीनतम है, सामवेद, सजुर्वेद तथा अथर्ववेद तिथिक्रम में ऋग्वेद के बाद आते हैं । कालान्तर में इन चारों वेदों के ऊपर टीकायें लिखी (गई जिनको- ब्राह्मण ग्रन्थों के रूप में जाना जाता है। शतपथ ब्राह्मण, ऐत्तरेय  ब्राह्मण,तैत्तिरीय ब्राह्मण , प्रमुखतम ब्राह्मण प्रन्थ हैं ।आरण्यक और उपनिषद् मूलरूप से ब्राह्मण ग्रंथो के अंग हैं । किन्तु कालांतर में ये स्वतन्त्र ग्रन्थों के रूप में प्रतिष्ठित हुए। ये वैदिक साहित्य के अन्तिम चरण का निर्माण करते हैं॥ ऋग्वेद.के अध्ययन से तत्कालीन समाज का जो चित्र उभरता है उसे इतिहासकार पूर्व-वैदिक युग की संज्ञा प्रदान करते हैं। अन्य तीन वेदों तथा ब्राह्मण ग्रन्थों एवं उपनिषदों से समाज के विषय में जो विवरण मिलता है उसे उत्तर वैदिक युग के नाम से जाना जाता है। भारतीय सभ्यता के इतिहास के सन्दर्भ में वेदिक युग का महत्त्व आधारभूमि के रूप में है और वेदिक साहित्य इसके विषय में हमें विस्तृत विवरण प्रदान करता है। वैदिक परम्परा के अन्तर्गत कालान्तर में साहित्य के उस व...

इतिहास के साहित्यिक स्रोत

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  साहित्यिक स्रोत साहित्यिक स्रोत को मोटे तौर पर ऐतिहासिक और अर्ध-ऐतिहासिक वर्गों में बाटा जा सकता है । दूसरी कोटि के अन्तर्गत वे नाटक, काव्य ग्रन्थ आदि आते हैं जिनका मुख्य प्रयोजन ऐतिहासिक विवरण देना नहीं है किन्तु जिनमें महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक सूचनायें सुरक्षित होती हैं,और इतिहासकार इन्हें सावधानी से निकाल कर अतीत के सम्बन्ध में अपने विवरण में उपयोग में लेता है। इन ग्रन्थों के धार्मिक सम्बन्ध के आधार पर इन्हे मुख्य रूप से तीन वर्गों में रखा जा सकता है : (क) ब्राह्मण साहित्य, (ख) बोद्ध साहित्य, (ग) जैन साहित्य ।

प्राचीन भारतीय इतिहास के स्मारक तथा खंडहर

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  स्मारक तथा खंडहर  स्मारक तथा खण्डहर पुरातात्विक साक्ष्य के महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं। इनसे वास्तुकला और शिल्पशार का ज्ञान तो होता ही है,साथ ही सामान्य-जन-जीवन और लोगों के धार्मिक विश्वास इत्यादि के संबंध में भी महत्वपूर्ण सूचनायें मिलती हैं। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के उत्खननों से प्राप्त खण्डहर सैंध्यावजनों के नगर-निर्माण कला, गृह निर्माण कला तथा तत्सम्बन्धी अन्य पक्षों पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं। भरहुत  मे प्राप्त स्तू्पों की वेदिकाओं और तोरण द्वारों पर जो अंकन कार्य हुए है उनसे न्यालीन जन-जीवन का व्यापक विवरण प्राप्त होता है। अजन्ता की गफाओं में बने चित्र भी इस दृष्टिकोश से बड़े महत्व के हैं। ये स्रोत अपने युग के धार्मिक विचारधारा को भी परिलक्षित करते हैं। इसी प्रकार गुप्तकाल में वैष्णव, बौद्ध, जैन एवं शैव धर्म की मूर्तियाँ उस काल में लोगों में धार्मिक सहिष्णुता को इंगित करती हैं। मूर्तियों और चित्रों को भिन्य-भिन्य वेश-भूषा एवं हाव-भाव उस युग की धार्मिक एवं सामाजिक मान्यताओं की जानकारी  प्रदान करते हैं |  अजन्ता की गफाओं में बने चित्र मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के ...

प्राचीन भारतीय इतिहास के लेखन में सिक्कों का साक्ष्य

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  सिक्कों का साक्ष्य प्राचीन भारतीय इतिहास के लेखन में सिक्कों से भी,बड़ी सहायता मिलती है। भारंतीय इतिहास की प्राचीनतम मुद्रायें (सिक्के) आहत मुद्रायें है जिन पर कोई लेख नहीं मिलता, अपितु विविध प्रकार के चिन्ह बने हुए मिलते हैं। 'रैप्सन और स्मिथ आदि विद्वानों का विचार है कि ये चिन्ह व्यापारियों के निजी चिन्ह थे।  प्राचीनतम मुद्रायें (सिक्के) ऐतिहासिक महत्त्व की कुछ समय पश्चात् की मुद्राओं से हमें इतिहास लेखन में अधिक सहायता मिलने लगती है। द्वितीय शताब्दी ईस्वी पूर्व तथा तृतीय शताब्दी ईस्वी पूर्व के भारतीय इतिहास के विषय में हमारा ज्ञान मुख्य रूप से सिक्कों पर ही आधारित है।  बहुत से इन्डो-ग्रीक , बैक्ट्रियाई तथा शक शासकों के नाम हमें केवल सिक्कों के कारण ही ज्ञात हैं। सिक्कों पर अंकित तिथियां उनके ऐतिहासिक महत्त्व को और भी बढ़ा देती हैं। अन्यथा भी सिक्कों की बनावट तथा अन्य विचित्रताओं से इतिहासकार कभी-कभी बड़े महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकालने में सफल होते हैं। सिक्कों पर शासक के नाम और उपाधियों के अतिरिक्त उसकी प्रतिकृति भी दी गई होती है जिससे कभी-कभी कुछ महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ...

प्राचीन भारत के आभिलेखिक साक्ष्य

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  आभिलेखिक साक्ष्य  इस साक्ष्य के अन्तर्गत वह सामग्री आती है जो हमें साहित्यिक ग्रंथो केअतिरिक्त किसी अन्य रूप में लिखी हुई प्राप्त होती है। इस साक्ष्य के मोटे तौर पर ये उपभेद किए जा सकते हैं - (1) गुफा लेख, (2) शिलालेख, (3) सतम्भ लेख तथा (4) ताम्र-पत्रों परअंकित लेंख।  इन लेखों में कुछ राजशासन अथवा राजाज्ञयें हैं, कुछ दान लेख हैं तथा कुछ प्रशस्तियाँ हैं। इस प्रकार इन लेखों के विषयों में बड़ी विविधता मिलती है। इतिहास के साक्ष्य के रूप में इनका महत्त्व इसलिये औरअधिक है क्योंकि ये उस समय के साक्ष्य होते हैं। प्राचीन भारत के कई लेखों से न केवल विविध राजनीतिक महत्त्व की समस्याओं पर प्रकाश पड़ता है अपितु तत्कालीन साहित्य, संस्कृति एवं जन-जीवन के अन्य पक्षों पर भी इनसे महत्त्वपूर्ण सूचनायें मिलती हैं। इन लेखों में शासकों के नाम, शासनवंश, तिथि और समसामयिक घटनाओं का विवरण मिलता है। कभी-कभी इन लेखों से साहित्यिक ग्रन्थों द्वारा पहले से वर्णित सूचनाओं का समर्थन होता है जिससे इतिहासकार उस विषय पर और भी अधिक निश्चित मत बनासकता है।  उदाहरण के लिये , मौर्यकालीन प्रशासन अथवा जन-जीव...

प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोतों का वर्गीकरण...

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प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोतों का वर्गीकरण.. .   जहां तक प्राचीन भारतीय .इतिहास के स्रोतों का प्रश्न  है,इन्हें मुख्य रूप से निम्न वर्गों के अन्तर्गत विभक्त किया जा सकता है-: पुरातात्विक, साहित्यिक,विदेशी विवरण । 1- पुरातात्विक- प्राचीन भारतीय इतिहास के ऐसे कई युग हैं जिनके विष॒य में मुख्य रूप से पुरातात्विक उत्खननों से प्राप्त सूचनाओं  से जानकारी मिलती है । भारत के भागैतिहासिक काल के विषय में हमारी पूरी  जानकारी पुरातात्विक साक्ष्य के ऊपर ही आधारित है ।भारतीय सभ्यता के प्रथम चरण सैन्ध॑व सभ्यता के विषय मे हम कुछ भी नहीं जान पाते यदि इसके विषय में हमें पुरातात्विक साक्ष्य से सहायता नहीं मिलती । ऐतिहासिक काल में भी कई स्थानों के पुरातात्विक उत्खननों से हमें ऐसी महत्त्वपूर्ण सूचनायें मिलती हैं जिनके विषय में हम कभी नहीं जान पाते। शिशुपालगढ़ ,राजगृह, अरिकामेडू इत्यादि ऐतिहासिक युग के स्थानों पर उत्खनन कार्यों से हमें तत्कालीन युग के विषय में बड़ी ही महत्वपूर्ण सूचनाएं मिली  हैं। पुरातात्विक साक्ष्य कई रूपों में मिलते हैं जैसे- बर्तन, मूर्ति, चित्रकला, सिक्...

इतिहास - विषय तथा इतिहास में साक्ष्यों का महत्व :

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इतिहास :- विषय-तथा इतिहास में साक्ष्यों का महत्व : जिसका अर्थ है ऐसा निश्चित रूप. से हुआ.। यह स्पष्ट -है कि इतिहास पूर्वजों का अध्ययन करता है। इस अध्ययन के अन्तर्गत वह उसके-विविध प्रकार के कार्यकलापों उसके द्वारा निर्मित विविध राजनीतिक एवं सामाजिक संस्थाओं तथा. उसको विविध मान्यताओं की चर्चा-करता है। इतिहासकार को अतीत प्रत्यक्ष रूप में प्राप्त नहींःहोता, अपितु अतीत के विषय में वो 'कुछ साक्ष्य प्राप्त होते हें, जिनके आधार-पर-वह अतीत का निर्माण-करता है ।ये साक्ष्य -आधार पर इतिहास लिखा-गया या जाना गया, हमें सरलता से प्राप्त नहीं हुआ और इसीलिए कुछ- समय पूर्व तक -विदेशी विद्वानों  क़ी, यह. मान्यता थी कि भारतीयों का कोई- इतिहास ही नहीं है । यह विचारधारा पाश्चात्य, इतिंहासकारों की शायद इसलिए है कि प्राचीन भारतीयों का दृष्टिकोण आध्यात्मिक प्रधान था वास्तव में यदि तिथि क्रम के प्रश्न को पृथक कर दिया जाए तो यह- निश्चित रुप से स्पष्ट हो जाएगा कि प्राचीन इतिहासकारों में इतिहास बुद्धि का अभाव था, यह अमाणित होगा कि भारत के प्राचीन ग्रंथो में बहुमूल्य ऐतिहासिक सामग्री निहित, है जिसे -विविध रूपों म...

क्या आपको पता है :- भारत नाम के पीछे सबकी अलग-अलग धारणाये हैं

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आईये हम जानते  हैं भारत नाम के पीछे सबकी अलग-अलग धारणाये हैं क्या हैं ,  प्राचीनकाल से भारत के अलग-अलग नाम रहे हैं मसलन जम्बूद्वीप, हिमवर्ष, अजनाभवर्ष, भारतखंड, , भारतवर्ष, आर्यावर्त, हिन्द, हिंदुस्तान और इंडिया।   मगर इन सबों में  "भारत " सबसे ज्यादा लोकमान्य और प्रचलित में रहा है। नामकरण को लेकर सबसे ज्यादा धारणाएं एवं मतभेद भी भारत को लेकर ही है। भारत की वैविध्यपूर्ण संस्कृति की तरह ही अलग-अलग कालखंडों में इसके अलग-अलग नाम भी मिलते हैं। इन नामों में कभी भूगोल उभर कर आता है तो कभी जातीय चेतना और कभी संस्कार।  भारतवर्ष का नामकरण * भारतवर्ष का नामकरण के विषय में ऐसा कहा जाता है कि दुष्यन्त के पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा है। * कुछ विद्वानों का मत है कि ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र का नाम भरत था, और उन्हीं के नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा है। * ईरानियों ने इस देश को हिन्दुस्तान कहकर सम्बोधित किया है और यूनानियों ने इसे इण्डिया कहा है। * प्राचीन साहित्य में भारतवर्ष को ‘भारतभूमि’ की संज्ञा दी गई है। इसे जम्बूद्वीप का एक भाग माना गया है। * भारत को ‘च...

हमारे देश का नाम भारत कैसे पड़ा ? How was the country named Bharat ?

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हमारे देश का नाम भारत कैसे पड़ा ? राजा दुष्यंत चन्द्रवंशी राजा थे जिनके माता-पिता के नाम के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न मत है। भागवत और विष्णु पुराण रैभ्य (रैभ), हरिवंश में सुंत, महाभारत में ऐति, और वायु पुराण में मल्लि को इसका पिता बताया गया है। इसी प्रकार कहीं पर माँ का नाम स्तनतरी मिलता है और कहीं पर उपदानवी ।  इनकी कथा इस प्रकार  है—   एक दिन राजा दुष्यंत शिकार खेलते खेलते थककर कण्व मुनि के आश्रम के पास जा निकले । उस समय आश्रम में कण्व मुनि की लड़की शकुंतला थी । उसने राजा का उचित सत्कार किया ।राज उसके रूप देख उनपर मुग्घ हो गए ।  पूछने पर राजा को मालूम हुआ कि शकुंतला एक अप्सरा के गर्भ से उत्पन्न विश्वामित्र ऋषि की कन्या है । जब राजा ने उनसे  विवाह का प्रस्ताव किया तब शकुंतला ने कहा 'यदि गांधर्व विवाह में कुछ दोष न हो और आप मेरे ही पुत्र को युवराज बनाएँ तो मैं विवाह के लिए सम्मत हूँ' ।  फिर उनदोनों ने  गांधर्व विवाह  किया  ।   राजा विवाह करके शकुंतला को कण्व ऋषि के आश्रम में  छोड़ अपनी राजधानी वापस चले गए । कुछ समय  बीतने...