लौकिक साहित्य

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लौकिक साहित्य इस श्रेणी के अन्तर्गत आने वाले ग्रन्थ विविध अन्य विषयों को ध्यान में रखकर लिखे गये हैं। किंतु इनकी अन्तर्सामग्री ऐतिहासिक दृष्टि से पर्याप्त महत्त्व की है। कौटिल्य का अर्थसास्त्र इस श्रेणी केअन्तर्गत आने वाला सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इससे मौर्यकालीन प्रशासन पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। पाणिनि द्वारा लिखी गई अष्टाध्यायी तथा पतंजलि द्वारा इस पर लिखा गया भाष्य (महाभाष्य) व्याकरण ग्रन्थ हैं किन्तु प्रसंग वंश ये कई महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक सूचनायें प्रदान करते हैं। डा. वासुदेव शरण ने अष्टाध्यायी के आधार पर पाणिनिकालीन भारत नामक पुस्तक लिखी है जिसमें तत्कालीन समाज एवं संस्कृति की बड़ा व्यापक चित्रण मिलता है। पतंजलि के महाभाष्य से  यवनों द्वरा साकेत तथा मध्यमिका व आक्रमण की उल्लेख मिलता है। गार्गी संहिता मे भी यवन आक्रमण को चर्चा मिलती है। तमिल ग्रंथ पुरुनानूरु तथा मणिमेकलाई की गनना भी इसी श्रेणी के साहित्य में की जानी चाहिये | प्राचीन भारत का इतिहास लिखने में आधुनिक विद्वनो को इन  ग्रन्थों में मिलने वाली सूचनाओं से बड़ी सहायता मिली है। इमी प्रसंग में उन नाटक ग्रंथ...

क्या आपको पता है :- भारत नाम के पीछे सबकी अलग-अलग धारणाये हैं

आईये हम जानते  हैं भारत नाम के पीछे सबकी अलग-अलग धारणाये हैं क्या हैं , 

प्राचीनकाल से भारत के अलग-अलग नाम रहे हैं मसलन जम्बूद्वीप, हिमवर्ष, अजनाभवर्ष, भारतखंड, , भारतवर्ष, आर्यावर्त, हिन्द, हिंदुस्तान और इंडिया।

 

मगर इन सबों में  "भारत " सबसे ज्यादा लोकमान्य और प्रचलित में रहा है। नामकरण को लेकर सबसे ज्यादा धारणाएं एवं मतभेद भी भारत को लेकर ही है। भारत की वैविध्यपूर्ण संस्कृति की तरह ही अलग-अलग कालखंडों में इसके अलग-अलग नाम भी मिलते हैं। इन नामों में कभी भूगोल उभर कर आता है तो कभी जातीय चेतना और कभी संस्कार। 



भारतवर्ष का नामकरण

* भारतवर्ष का नामकरण के विषय में ऐसा कहा जाता है कि दुष्यन्त के पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा है।

* कुछ विद्वानों का मत है कि ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र का नाम भरत था, और उन्हीं के नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा है।

* ईरानियों ने इस देश को हिन्दुस्तान कहकर सम्बोधित किया है और यूनानियों ने इसे इण्डिया कहा है।

* प्राचीन साहित्य में भारतवर्ष को ‘भारतभूमि’ की संज्ञा दी गई है। इसे जम्बूद्वीप का एक भाग माना गया है।

* भारत को ‘चतु: संस्थान संस्थितम्’ कहा गया है।

* हिन्दू शब्द भी महान् सिन्धु नदी से निकला है। सिन्धु प्रदेश प्राचीनतम सभ्यता का विकास स्थल रह चुका है।

महाभारत से ढाई हजार साल पहले 'भारत'


इस महायुद्ध को महाभारत से भी ढाई हजार वर्ष पूर्व हुआ बताया जाता है। साधारण सी बात है कि वह युद्ध जिसका नाम ही महा'भारत' है कब हुआ होगा? इतिहासकारों के मुताबिक, ईसा से करीब ढाई हजार साल पहले कौरवों-पांडवों के बीच महासमर हुआ था। 

एक गृहकलह जो महासमर में बदल गई यह तो ठीक है, पर इस देश का नाम भारत है और दो कुटुम्बों की कलह की निर्णायक लड़ाई में देश का नाम क्यों आया। इसकी वजह यह कि इस युद्ध में भारत की भौगोलिक सीमा में आने वाले लगभग सभी साम्राज्यों ने हिस्सा लिया था, इसलिए इसे महाभारत कहते हैं। 

दाशराज्ञ युद्ध इससे भी ढाई हजार साल पहले हुआ बताया जाता है। यानी आज से साढ़े सात हजार साल पहले। इसमें तृत्सु जाति के लोगों ने दस राज्यों के संघ पर अभूतपूर्व विजय प्राप्त की। तृत्सु जनों को भरतों का संघ कहा जाता था। इस युद्ध से पहले यह क्षेत्र अनेक नामों से प्रसिद्ध था। इस विजय के बाद तत्कालीन आर्यावर्त में भरत जनों का वर्चस्व बढ़ा और तत्कालीन जनपदों के महासंघ का नाम भारत हुआ अर्थात भरतों का। 

मध्य काल में भारत


मध्य काल में जब तुर्क और ईरानी यहां आए तो उन्होंने सिंधु घाटी से प्रवेश किया, वो स का उच्चारण ह करते थे और इस तरह से सिंधु का अपभ्रंश हिंदू हो गया ,उन्होंने यहां के निवासियों को हिंदू कहा और हिंदुओं के देश को हिंदुस्तान का नाम मिला । सिंधु नदी का दूसरा नाम इंडस भी था।  इस नदी के किनारे विकसित सभ्यता इंडस वैली सिविलाइजेशन कहलाई सिंधु नदी का इंडस नाम भारत आए विदेशियों ने रखा। सिंधु सभ्यता के कारण भारत का पुराना नाम सिंधु भी था, जिसे यूनानी में इंडो या इंडस भी कहा जाता था जब ये शब्द लैटिन भाषा में पहुंचा तो बदलकर इंडिया हो गया । 

जब अंग्रेज भारत में आए उस समय हमारे देश को हिन्दुस्तान कहा जाता था।  हालांकि ये शब्द बोलने में उन्हें परेशानी होती थी।  जब अंग्रेजों को पता चला कि भारत की सभ्यता सिंधु घाटी है जिसे इंडस वैली भी कहा जाता है, इस शब्द को लैटिन भाषा में इंडिया कहा जाता है तो उन्होंने भारत को इंडिया कहना शुरू कर दिया ।  अंग्रेजों के शासनकाल में इंडिया नाम काफी प्रसिद्ध हुआ और हमारा देश दुनिया में इस नाम से जाना जाने लगा । 

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