लौकिक साहित्य
प्राचीन भारतीय इतिहास के लेखन में सिक्कों से भी,बड़ी सहायता मिलती है। भारंतीय इतिहास की प्राचीनतम मुद्रायें (सिक्के) आहत मुद्रायें है जिन पर कोई लेख नहीं मिलता, अपितु विविध प्रकार के चिन्ह बने हुए मिलते हैं। 'रैप्सन और स्मिथ आदि विद्वानों का विचार है कि ये चिन्ह व्यापारियों के निजी चिन्ह थे।
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| प्राचीनतम मुद्रायें (सिक्के) |
ऐतिहासिक महत्त्व की कुछ समय पश्चात् की मुद्राओं से हमें इतिहास लेखन में अधिक सहायता मिलने लगती है। द्वितीय शताब्दी ईस्वी पूर्व तथा तृतीय शताब्दी ईस्वी पूर्व के भारतीय इतिहास के विषय में हमारा ज्ञान मुख्य रूप से सिक्कों पर ही आधारित है।
बहुत से इन्डो-ग्रीक , बैक्ट्रियाई तथा शक शासकों के नाम हमें केवल सिक्कों के कारण ही ज्ञात हैं। सिक्कों पर अंकित तिथियां उनके ऐतिहासिक महत्त्व को और भी बढ़ा देती हैं। अन्यथा भी सिक्कों की बनावट तथा अन्य विचित्रताओं से इतिहासकार कभी-कभी बड़े महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकालने में सफल होते हैं। सिक्कों पर शासक के नाम और उपाधियों के अतिरिक्त उसकी प्रतिकृति भी दी गई होती है जिससे कभी-कभी कुछ महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ मिलती हैं। शक शासकों की मुद्राओं पर शासक के साथ 'युवराज का नाम भी मिलता है जिससे उत्तराधिकार क्रम को समझने में कोई कठिनाई नहीं होती।
सिक्कों को केवल प्राप्ति के आधार पर कभी-कभी इंतिहासकार को यह निष्कर्ष निकालने में सहायता मिलती है कि जहां से सिक्कों की प्राप्ति हुई वह प्रदेश उस शासक के अधिकार में रहा होगा। समुद्रगुप्त की कुछ मुद्राओं पर उसे वीणा बजाते हुए दिखाया गया है जिम्तसे उसकी व्यक्तिगत रुचि का पता चलता है। साथ ही कुछ मुद्राओं पर अंकित अश्व एवं यूप एवं “अश्वमेघ पराक्रम” लेख शासक द्वारा अश्वमेध यज्ञ किये जाने का बोध कराते हैं। किसी भी राज्य की आर्थिक सम्पनता सिक्कों से आंकी जा सकती है। उदाहरणतः जहाँ एक ओर पूर्व गुप्त शासकों द्वारा चालित शुद्ध स्वर्ण सिक्के प्राप्त होते हैं वहीं स्कन्दगुप्त के स्वर्ण सिक्कों में मिलावट राजनीतिक अशान्ति एवं बिगड़ती हुई आर्थिक स्थिति को दर्शाता है। इसी प्रकार गुप्त मुद्राओं के उस प्रकार से जिसे चंद्रगुप्त कुमारदेवी प्रकार कहा जाता है गुप्त शासक चन्द्रगुप्त प्रथम तथा लिच्छवि राजकन्या कुमारदेवी के महत्त्वपूर्ण वैवाहिक सम्बन्ध की सूचना मिलती है जिसके परिप्रेक्ष्य मे समुद्रगुप्त द्वारा प्रयाग प्रशस्ति में स्वयं को 'लिच्छवि-दौहित्र' कहना अधिक स्पष्ट हो जाता है । सिक्कों का ऐतिहासिक महत्व इसी से स्पष्ट हो जाता है कि दो सौ ईस्वीपूर्व में लगभग सौ वर्षों तक पंजाब प्रदेश पर लगभग तीस बेट्रियाई शासकों ने शासन किया और इनके विषय में हमारी जानकारी केवल सिक्कों पर आधारित है।
यदा-कदा सिक्कों पर दो भिन्न कुलों के राजाओं के नाम अंकित मिलते हैं, जैसे जोगलथम्बी से प्राप्त शकराज नहपान के सिक्कों पर सातवाहन नरेश गोतमीपुत्र शातकर्णी का नाम भी पाया जाता है जो सातवाहन शासकों की शर्कों पर विजय का सूचक हैं ।
प्रायः एक शासक के काल के बहुसंख्यक सिक्के उसके शासन की स्थिरता को सूचित करते हैं, तो दूसरी ओर किसी शासक के अल्पसंख्यक सिक्के उसके अल्पकालीन अथवा संकटपूर्ण शासन की जानकारी देते हैं।
घार्मिक इतिहास को समझने में भी ये सिक्के कभी-कभी बड़े सहायक होते हैं। उदाहरण के लिये, हम कुषाण शासकों के सिक्कों को ले सकते हैं। कुषाण शासक कुजुल कैडफिसेज को उसके सिक्कों पर “सत्य-धर्म-स्थित' कहा गया है जिससे ज्ञात होता है कि वह बौद्ध धर्म का अनुयायी था। विम कैडफिसेज के सिक्कों पर 'महेश्वरं लिखा हुआ मिलता है तथा साथ ही त्रिशूल, नंदी और शिव की आकृति बनी हुई मिलती है। उसके शैव धर्म के अनुयायी होने में इस प्रकार कोई सन्देह नहीं रह जाता। कनिष्क की मुद्राओं पर पहली बार बुद्ध की आकृति मिलती है। विविध शासकों के सिक्कों पर लक्ष्मी के कई प्रकार मिलते हैं जिससे इस देवी के कई रूप एवं मुद्राओं (भावों) के दर्शन होते हैं।
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