लौकिक साहित्य
इतिहास लेखन में अपेक्षाकृत वैज्ञानिक पद्धति का निर्वाह करते हुए लिखे गये ग्रंथो में सबसे पहले बाण द्वारा लिखे गये हर्ष-चरित का नाम लिया जा सकता है। बाण हर्ष का समसामयिक था और अपने इस ग्रन्य में उसने वर्धन वंश का आरम्भिक इतिहास तथा अपने संरक्षक शासक हर्ष का जीवन वृतान्त दिया है। यधपि इस ग्रंथ में हर्ष की पूरे जीवनी नहीं मिलती, तथापि उसके जीवन से सम्बन्धित कई महत्वपूर्ण घटनाओं का विवण हमें इस ग्रंथ में मिलता है। आभिलेखिक साक्ष्यों से भी इसके विवरणों की पुष्टि होती है। इतिहास ग्रन्थों में सबसे महत्वपूर्ण कल्हण रचित राजतरंगिणी है जिसकी रचना 1148 ई. में प्रारम्भ हुईं। यह किसी एक शासन वंश का ही नहीं, अपितु कश्मीर का सामान्य इतिहास है। इसमें पूर्ववर्ती शासनवंशीय इतिहासों को भी स्रोत बनाया गया है और लेखक इस बात के प्रति सचेत लगता है कि घटनाओं का यथारूप विवरण ही दिया जाये। बाद में कई कश्मीरी इनिहासकारो ने इसके पूरक ग्रन्थ लिखे। 15वीं शताब्दी के मध्य में उत्पन्न जोनराज तथा उनके शिष्य श्रीवर ने तथा 16वीं शताब्दी में राजभट्ट तथा शुक ने अपने ग्रन्थों की रचना की।
हर्ष के एक शताब्दी बाद वाक्पतिराज ने गौडवहो नामक ग्रन्थ लिखा, जिसमें कन्नोज के शासक यशोवर्मन् के विज़यों की चर्चा हुई है। 11 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में पद्मगुप्त परिमल ने परमार शासक सिन्धुराज की जीवनी को आधार बनाकर नवसाहसांकचरित नामक ग्रन्थ लिखा। सत्य घटनाओं पर आधारित होने पर भी यह ग्रन्थ एक प्रेम कथा में परिवर्तित हो गया है। 11 वीं शताब्दी के अन्त में ही कश्मीर के लेखक बिल्हण ने विक्रमांकदेवचरित नामक ग्रन्थ में कल्याणी, के चालुक्यवंश का इतिहास दिया है। 12 वीं शताब्दी में लिखे गये पृथ्वीराजरासो में प्रतिहार, परमार, चालुक्य एवं चाहमान शासन वंशों की उत्पत्ति बतायी गई है। हिन्दू धर्म की रक्षा में सचेष्ट इन चार राजकुलों को एक साथ रखा गया है। जयसिंह सूरि द्वारा रचित हम्मीर महाकाव्य एक अन्य सा महत्वपूर्ण ग्रन्थ है।
आनन्द भट्ट ने अपनी पुस्तक वल्लालचरित में सेनवंश का इतिहास दिया है। ये सभी ग्रन्थ आधुनिक अर्थ में इतिहास ग्रन्थ नहीं हैं किन्तु इनमें सत्य से दूर हुए बिना कथानक को काव्य शैली में उपस्थित किया गया है।
बाद में क्षेत्रीय भाषाओं में विविध प्रकार के ग्रन्थों की रचना हुई जिसमें प्रचुर ऐतिहासिक सामग्री देखी जा सकती है तमिल भाषा में उपलब्ध प्राचीनतम साहित्य ऐतिहासिक सामग्री प्राप्य हे एट्डुतोगड नाम से ज्ञात कविताओं का संग्रह है-। इसमें पाण्ड्य, चोल तथा चेर राजवंश का इतिहास मिलता है। प्राचीन तमिल साहित्य के पांच महाकाव्यों में (पेरूकाप्पियम महाकाव्य) एक शिलप्पदिकारम ऐतिहासिक दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण है। इसी प्रकार का एक अन्य ग्रन्थ मणिमेकलाइ है। जयन्गोण्डार लिखित कलिंगत्तुप्परणि में कुलोत्तुंग प्रथम (1070-1181) के कलिंगं विजय का उल्लेख मिलता है। तेलगू भाषा में जिन ग्रन्थों की रचना हुई उनमें कुमार धूर्जटि द्वारा लिखित कृष्णदेवरायविजयमु सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। इसमें विजयनगर राज्य के-सबंसे प्रतापी शासक कृष्णदेवराय का इतिहास मिलता है| आसाम में लिखे गए बुरुंजियों तथा महाराष्ट्र मे लिखे गये बखरों में पर्याप्त ऐतिहासिक सामंग्री मिलती है। उड़ीसा में वंशावलियां लिखी गई जिन्हें उड़िया भाषा में मादलापांजी कहते हैं। राजस्थान में विभिन्न राज्यों ने अपने इतिहास को ख्यातों में सुरक्षित रखा है। ये गद्य में लिखे हुए हैं | इनका समय सोलहवीं शताब्दी के बाद का है। ख्यातोंमें नैणसी की ख्यात सर्वाधिक प्रसिद्ध ख्यात है। इनके अतिरिक्त विभिन्न राजाओं पर रास नामक गन्थ लिखे गए। इनमें सबसे प्राचीन पृथ्वीराज रास है जो पृथ्वीराज तृतीय के दरबारी कवि चन्द्र की रचना मानी जाती हे। इसके अधिकांश भाग चोदहवीं शताब्दी के बाद के माने जाते हैं। राजपूतों का सबसे महत्वपूर्ण कुल मेदपाट (मेवाड़) के गुहिलपुत्रों का कुल है। चौदहवीं शताब्दी से यह कुल सिसोदिया कुल के नाम से जाना जाने लगा था। सबसे अधिक ख्यात और रास मेवाड़ प्रदेश से मिलते हैं। इनमें प्राचीनतम खुम्माण रास है।
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