लौकिक साहित्य
जहां तक प्राचीन भारतीय .इतिहास के स्रोतों का प्रश्न है,इन्हें मुख्य रूप से निम्न वर्गों के अन्तर्गत विभक्त किया जा सकता है-: पुरातात्विक, साहित्यिक,विदेशी विवरण।
1- पुरातात्विक- प्राचीन भारतीय इतिहास के ऐसे कई युग हैं जिनके विष॒य में मुख्य रूप से पुरातात्विक उत्खननों से प्राप्त सूचनाओं से जानकारी मिलती है । भारत के भागैतिहासिक काल के विषय में हमारी पूरी जानकारी पुरातात्विक साक्ष्य के ऊपर ही आधारित है ।भारतीय सभ्यता के प्रथम चरण सैन्ध॑व सभ्यता के विषय मे हम कुछ भी नहीं जान पाते यदि इसके विषय में हमें पुरातात्विक साक्ष्य से सहायता नहीं मिलती ।
ऐतिहासिक काल में भी कई स्थानों के पुरातात्विक उत्खननों से हमें ऐसी महत्त्वपूर्ण सूचनायें मिलती हैं जिनके विषय में हम कभी नहीं जान पाते। शिशुपालगढ़ ,राजगृह, अरिकामेडू इत्यादि ऐतिहासिक युग के स्थानों पर उत्खनन कार्यों से हमें तत्कालीन युग के विषय में बड़ी ही महत्वपूर्ण सूचनाएं मिली हैं।
पुरातात्विक साक्ष्य कई रूपों में मिलते हैं जैसे- बर्तन, मूर्ति, चित्रकला, सिक्के ,भवन, अभिलेख, हथियार और औजार आदि। इनसे सामान्य जन-जीवन के विविध पक्षों पर प्रकाश पड़ताहै। ये साक्ष्य इस दृष्टिकोण से साहित्यिक साक्ष्यों की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं कि इनमें किसी प्रकार का अतिश्योक्ति वर्णन नहीं होता, जो कि साहित्यिक कृतियों की ऐतिहासिकता में विशेष बाधा के रूप में दिखाई पड़ता है। कभी-कभी इन साक्ष्यों से मनुष्यों की मन्यताओं और मूल्यों के विषय में भी अनुमान लगाया जा सकता है।
पुरातात्विक कैसे पता करते हैं कि कोई स्थल पुरास्थल है?
यह सुपरपोज़ीशन के नियम पर आधारित है। जब पुरातात्विक अवशेष जमीन की सतह से नीचे होते हैं , प्रत्येक के संदर्भ की पहचान करना, पुरातत्वविद् के लिए उस पुरातात्विक स्थल के विषय में निर्णय लेने के लिए आवश्यक होता है, साथ ही इससे उस स्थल की प्रकृति तथा तारीख के विषय में भी जानकारी मिलती है।
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