लौकिक साहित्य

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लौकिक साहित्य इस श्रेणी के अन्तर्गत आने वाले ग्रन्थ विविध अन्य विषयों को ध्यान में रखकर लिखे गये हैं। किंतु इनकी अन्तर्सामग्री ऐतिहासिक दृष्टि से पर्याप्त महत्त्व की है। कौटिल्य का अर्थसास्त्र इस श्रेणी केअन्तर्गत आने वाला सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इससे मौर्यकालीन प्रशासन पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। पाणिनि द्वारा लिखी गई अष्टाध्यायी तथा पतंजलि द्वारा इस पर लिखा गया भाष्य (महाभाष्य) व्याकरण ग्रन्थ हैं किन्तु प्रसंग वंश ये कई महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक सूचनायें प्रदान करते हैं। डा. वासुदेव शरण ने अष्टाध्यायी के आधार पर पाणिनिकालीन भारत नामक पुस्तक लिखी है जिसमें तत्कालीन समाज एवं संस्कृति की बड़ा व्यापक चित्रण मिलता है। पतंजलि के महाभाष्य से  यवनों द्वरा साकेत तथा मध्यमिका व आक्रमण की उल्लेख मिलता है। गार्गी संहिता मे भी यवन आक्रमण को चर्चा मिलती है। तमिल ग्रंथ पुरुनानूरु तथा मणिमेकलाई की गनना भी इसी श्रेणी के साहित्य में की जानी चाहिये | प्राचीन भारत का इतिहास लिखने में आधुनिक विद्वनो को इन  ग्रन्थों में मिलने वाली सूचनाओं से बड़ी सहायता मिली है। इमी प्रसंग में उन नाटक ग्रंथ...

हमारे देश का नाम भारत कैसे पड़ा ? How was the country named Bharat ?

हमारे देश का नाम भारत कैसे पड़ा ?

राजा दुष्यंत चन्द्रवंशी राजा थे जिनके माता-पिता के नाम के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न मत है। भागवत और विष्णु पुराण रैभ्य (रैभ), हरिवंश में सुंत, महाभारत में ऐति, और वायु पुराण में मल्लि को इसका पिता बताया गया है। इसी प्रकार कहीं पर माँ का नाम स्तनतरी मिलता है और कहीं पर उपदानवी ।

 इनकी कथा इस प्रकार  है—   एक दिन राजा दुष्यंत शिकार खेलते खेलते थककर कण्व मुनि के आश्रम के पास जा निकले । उस समय आश्रम में कण्व मुनि की लड़की शकुंतला थी । उसने राजा का उचित सत्कार किया ।राज उसके रूप देख उनपर मुग्घ हो गए ।


 पूछने पर राजा को मालूम हुआ कि शकुंतला एक अप्सरा के गर्भ से उत्पन्न विश्वामित्र ऋषि की कन्या है । जब राजा ने उनसे  विवाह का प्रस्ताव किया तब शकुंतला ने कहा 'यदि गांधर्व विवाह में कुछ दोष न हो और आप मेरे ही पुत्र को युवराज बनाएँ तो मैं विवाह के लिए सम्मत हूँ' । फिर उनदोनों ने गांधर्व विवाह किया 



 राजा विवाह करके शकुंतला को कण्व ऋषि के आश्रम में  छोड़ अपनी राजधानी वापस चले गए । कुछ समय  बीतने  पर शकुंतला को एक पुत्र रूपी धन प्राप्त हुआ ,जो बहुत बलशाली थे , ऐसा माना जाता है कि वह बाल्यकाल में वन में खेल ही खेल में अनेक जंगली जानवरों को पकड़कर या तो उन्हें पेड़ों से बाँध देते थे या फिर उनकी सवारी करने लगते थे। इसी कारण ऋषि कण्व के आश्रम के ऋषियों  ने उनका नाम सर्वदमन रख दिया।

उधर राजा अपने राज्य कार्य में इतने वियस्त हो गए की अपनी रानी शकुंतला को भूल गए थे लेकिन जाते समय उन्हें शकुंतला को एक मुद्रिका दी थी एक समय वह मुद्रिका शकुंतला से नदी में नहाते समय खो गई थी जिसे एक मछली ने निगल लिया था एक दिन किसी मछुआरे ने उस मछली को पकड़कर जब काटा तो उसे राजा की मुद्रिका प्राप्त हुई वह उसे लेकर बेचने गया लेकिन उसे इसका मूल्य कोई नहीं दे सका , फिर किसी ने उसे राज्य दरवार जाने को कहा जहाँ उसे मुद्रिका का उचित मूल्य मिलता फिर वह राजदरबार में गया जब राजा दुष्यंत ने उस मुद्रिका को देखा तो उन्हें शकुंतला की वापस याद आ गई और उसी समय वो आश्रम के और शकुंतला को लाने निकल गए , जब वो जंगल आश्रम के निकट पहुचे तो उन्होंने देखा एक बच्चा शेर के बच्चो के साथ खेल रहा है , जिसे देख उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ और जानना चाहते थे की इतने बलशाली बच्चा कौन हो सकता है , और वो इसी सोच के साथ वो बच्चे के पास गए और उसे अपने गोद में लेकर प्यार करने लगे।


इतने में शकुंतला भी आ गयी ,तभी राजा ने शकुंतला से माफ़ी मांगी और अपने साथ राज्य चलने को कहा और इस बच्चे के बारे में पूछने पर पता चला की ये उनका पुत्र है , तभी वो उसको अपने गले से लगा लिया और उनका नाम भरत रखा और सत्कार पूर्वक भी शकुंतला और अपने पुत्र भरत को लेकर आ गए आगे चलकर वही भरत चक्रवर्ती के नाम से हस्तिनापुर के राजा बने । भरत एक चक्रवर्ती सम्राट यानी चारों दिशाओं की भूमि का अधिग्रहण कर विशाल साम्राज्य का निर्माण कर अश्वमेध यज्ञ किया, जिसके चलते उनके राज्य को भारतवर्ष नाम मिला। आज हमारे देश का नाम भारत उन्हीं के नाम की ऊपर रखा गया है। 

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