लौकिक साहित्य

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लौकिक साहित्य इस श्रेणी के अन्तर्गत आने वाले ग्रन्थ विविध अन्य विषयों को ध्यान में रखकर लिखे गये हैं। किंतु इनकी अन्तर्सामग्री ऐतिहासिक दृष्टि से पर्याप्त महत्त्व की है। कौटिल्य का अर्थसास्त्र इस श्रेणी केअन्तर्गत आने वाला सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इससे मौर्यकालीन प्रशासन पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। पाणिनि द्वारा लिखी गई अष्टाध्यायी तथा पतंजलि द्वारा इस पर लिखा गया भाष्य (महाभाष्य) व्याकरण ग्रन्थ हैं किन्तु प्रसंग वंश ये कई महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक सूचनायें प्रदान करते हैं। डा. वासुदेव शरण ने अष्टाध्यायी के आधार पर पाणिनिकालीन भारत नामक पुस्तक लिखी है जिसमें तत्कालीन समाज एवं संस्कृति की बड़ा व्यापक चित्रण मिलता है। पतंजलि के महाभाष्य से  यवनों द्वरा साकेत तथा मध्यमिका व आक्रमण की उल्लेख मिलता है। गार्गी संहिता मे भी यवन आक्रमण को चर्चा मिलती है। तमिल ग्रंथ पुरुनानूरु तथा मणिमेकलाई की गनना भी इसी श्रेणी के साहित्य में की जानी चाहिये | प्राचीन भारत का इतिहास लिखने में आधुनिक विद्वनो को इन  ग्रन्थों में मिलने वाली सूचनाओं से बड़ी सहायता मिली है। इमी प्रसंग में उन नाटक ग्रंथ...

बौद्ध ग्रन्थ

 बौद्ध ग्रन्थ

छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व में प्राचीन भारत में जो धार्षिक आन्दोलन हुआ  उसके अन्तर्गत बौद्ध और जैन धर्मों को विशेष रूप से प्रतिष्ठा हुई। कालान्तर में इन धर्मों से सम्बद्ध विविध ग्रन्थों की रचना हुई, जिनमें भरपूर ऐतिहासिक सामग्री भरी पड़ी है । 

“ बौद्ध ग्रन्थों में सबसे पहले जातक ग्रन्थों का स्थान आता है । जातक कथाओं में बुद्ध के पूर्व जीवन की कथायें दी गई हैं ओर इनमें से कुछ कथायें छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व के पहले के जन-जीवन पर भी प्रकाश डालती है। इन्हीं जातक कथाओं को आधार बनाकर रतिलाल मेहता ने अपनी पुस्तक प्री-बुद्धिस्ट इण्डिया में बुद्ध से पूर्व के भारतीय समाज और जन-जीवन का विवरण देने का प्रयास किया है | प्रारम्भिक बोद्ध ग्रन्थ पालि भाषा में लिखे हुए हैं। बुद्ध के वचनों का संकलन तीन पृथक् -पृथक् ग्रन्थों के अन्तर्गत हुआ जिन्हें सामूहिक रूप से त्रिपिटक की संज्ञा दी गई। ये तीन पिटक हैं - विनय पिटक, सुत्त पिटक एवं अभिधम्म पिटक | त्रिपिटक का रचना काल तथा इनमें प्राप्त सूचनाओं का समय मुख्य रूप से छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व तथा तीसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व के बीच का मानना चाहिये । पालि ग्रंथो में एक अन्य महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ मिलन्दपज्हों (मिलिन्द-प्रश्न) है। 

इसमें यूनानी शासक मिनेन्डर, जिसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था, तथा बौद्ध आचार्य नागसेन के बीच हुए वार्तालाप का वृतान्त दिया गया है। दीपवंश और सिंहली इतिहासकार महानाम द्वारा रचित महावंश लंका में लिखे गये बौद्ध ग्रन्थ हैं। यंद्यपि ये ग्रन्थ तिथि क्रम की दृष्टि से काफी बाद के हैं तथा अन्य देश में लिखे गये किन्तु प्राचीन काल के महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक विवरण इनमें सुरक्षित मिलते हैं। परवर्तीकाल में संस्कृत भाषा में लिखे गये महत्त्वपूर्ण बौद्ध ग्रन्थों में महावस्तु, लेलितविस्तर व बुद्धचरित हैं। इन ग्रन्थों में तत्कालीन सामाजिक एव सांस्कृतिक जीवन के विषय में सूचनायें मिलती हैं। बोद्ध धर्म के सैद्धान्तिक एवं दार्शनिक विकास को समझने में भी इन ग्रन्थों से बड़ी सहायता मिलती है। अवदान ग्रन्थों में दिव्यावदान का उपयोग मौर्य काल के इतिहास के लेखन में किया गया है। इन ग्रन्थों के अतिरिक्त कई बौद्ध ग्रन्थ संस्कृत में भी लिखे गये। इनमें महावस्तु, ललितविस्तार, बुद्ध-चरित्र, सोंदरानन्द, दिव्यादान, मंजूश्री-मूलंकल्प आदि उल्लेखनीय हैं। महावस्तु मुख्यतः महात्मा बुद्ध का जीवन वृत है। यह मूलतः हीनयान सम्प्रदाय का ग्रन्थ होते हुए भी महायान सम्प्रदाय की विशिष्टताओं को स्थान प्रदान करता है [ ललितविस्तार में बुद्ध को दैवी शक्ति के रूप में स्वीकार करते हुए, उनके अद्भुत क्रियाकलापों का वर्णन है। कनिष्क के समकालीन महाकवि अश्वघोष द्वारा रचित बुद्ध चरित्र एवं सौन्दरानन्द-बुद्ध के जीवन तथा सिद्धान्तों का उल्लेख करते हैं। मंजुश्रीमूलकल्प नामक एक अन्य ग्रन्थ यद्यपि संकेतभाषा में लिखा गया है तथापि विद्वानों द्वारा इसकी ऐतिहासिक उपयोगिता स्वीकार की.जाती हे।

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